झरणा (Jharana)
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झरणा
सागर जिसका लक्ष्यऐसी एक लड़की — जिसने रुकना नहीं सीखा
झरणा के बारे में दो शब्द...
झरणा...
एक सतत प्रवाह, जो हर क्षण अपनी शीतलता और अमृत स्पर्शसे सबको संजीवनी प्रदान करती है। उसे कभी अपने अस्तित्वकी चिंता नहीं होती—जो राह मिले, उसी पर चल पड़ती है यह सोचकर कि "चलना, चलते रहना ही मेरा परम धर्म है।"
उपन्यास की नायिका झरणा भी प्रकृति की इस झरणा की तरह ही जीवन में आगे बढ़नेमें विश्वास रखती है।
बाधाएँ और विघ्न जीवन के साथी हैं—हर मोड़ पर मिलते हैं, मानो दोस्ती निभाने आए हों।
अब दोस्तोंसे डरना कैसा?
इसी सोचको अपने मन में बसाकर, सुख-दुखको गले लगाकर झरणा निरंतर आगे बढ़ती है।
कभी उसे सफलता मिलती है, तो कभी विफलताका स्वाद चखना पड़ता है।
लेकिन क्या वह अपने प्रेमको पा पाती है?
क्या वह समाज के नियमों और बंधनों के आगे झुकती है?
या फिर हर बंधनको तोड़कर, सच्चे मन और अटूट संकल्प के साथ अपनी राह स्वयं बनाती है?
क्या झरणा नारी शक्ति की उस असीम ऊर्जाका प्रमाण बन पाती है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है?
आइए, इन सभी प्रश्नोंका उत्तर पाने के लिए पढ़ते हैं — "झरणा" — एक प्रेरक, संघर्षशील और सशक्त नारी की जीवन यात्रा।
श्रीमती सङ्गीता पण्डा
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